Monday, 9 November 2015

प्रेम जिंदगी को सजाने के लिये है

प्रेम जिंदगी को सजाने के लिये है …………………

प्रेम जिंदगी का वह खुबसूरत अहसास है जिसे हर कोई महसूस करना चाहता हैं। एक ऐसा पवित्र जज्बात जो हर रिश्ते की बुनियाद है। इस अहसास को अगर महसूस करो तो मानो जन्नत मिल जाती है, रब तक पहुंचने का यह सबसे आसान तरीका है। सच्चा प्रेम और रब दोनों ही बडी मुश्किल से मिलते हैं। प्रेम का रिश्ता बड़ा ही अटूट रिश्ता है,जो कुछ पल का नहीं जंम जंमातर का होता है। यह एक पल का नहीं एक साल का नहीं यह रिश्ता तो सदियों का होता है। प्रेम किसी से कभी भी हो सकता है। प्रेम के अनेक रुप होते है। मां का प्रेम भाई बहन का प्रेम दोस्तों का प्रेम। सबके लिए प्रेम की परिभाषा अलग अलग है।  लेकिन किसी ने प्रेम में सच्चे दोस्त को पाया तो किसी ने दोस्त में सच्चे प्रेम को पा लिया। अंत में जीत सच्चे प्रेम की ही होती है। किसी भी रिश्ते की बुनियाद प्रेम  और विश्वास होनी चाहिए नाकि किसी और बाहरी जज्बात से ,लेकिन आज के जमाने में प्रेम के रिश्तों में मिलावट होने लगी है। बस सिर्फ इस प्रेम के माध्यम से जिंदगी को एक नये रुप मे देखने और सजाने की जरुरत होती है। इसके लिये हमे प्रेम और प्यार के बिच के अंतर को समझना होगा । आम तौर पर लोग प्रेम और प्यार को एक ही समझते है , लेकिन दोनो के बिच बहुत गहरी खाई है । प्रेम बिना किसी मकसद का होता है तो प्यार मे स्वार्थ कि मात्रा पाई जाती है । खैर वह अलग विषय है कभी दुसरे बार इस पर चर्चा करेगे ।

कहते है प्रेम अंधा होता है, पागल होता है, दिवाना होता है, एक नशा है, एक खुशी है, वह जिंदगी है।  जहां प्रेम अपने को दूसरे की नज़र से देखने की एक दृष्टी है । प्रेम मे पाना नही होता वह तो एक त्याग है जैसे राधा ने भी किशन से प्रेम किया था, क्या उसने किशन को पाया? प्रेम का दूसरा नाम त्याग, इन्तजार बलिदान और विश्वास है। किशन अंत में रुक्मिणी के ही हुए। इसका यह मतलब नहीं हुआ कि राधा का प्रेम सच्चा नहीं था। आज भी लोग राधा किशन की जोडी को ही अमर मानते है और साथ में उन दोनों की ही पूजा करते है। क्योंकि राधा ने कभी किशन को पाने की कोशिश नहीं की। अगर आपका प्रेम सच्चा हो तो वह अमर हो जाता है। प्रेम बाटने और लुटाने का नाम है। राधा के जीवन का अर्थ किशन थे। मीरा जो किशन की दीवानी थी। लोगो की इतनी तोहमत लगाने के बाद भी उसके लबो पर सिर्फ नाम होता था तो भगवान श्री कृष्ण का। त्याग और बलिदान की मूरत बनी। अपना सारा जीवन व्यतित किया किशन के चरणों में। जहर का प्याला भी पिया हंसते हंसते। यही तो प्रेम था?

कभी इंसान प्रेम कि गहराई में जाकर देखता है शायद नहीं , हम इंसान जन्म से मृत्यु तक असंख्य लोगों / स्थान / वस्तु / जीव के संपर्क में आते है। कुछ से हमे विशेष स्नेह हो जाता है,कुछ बहुत अजीज मित्र बन जाते हैं कुछ आते और चले जाते है । जिनसे हमारा विशेष स्नेह बन जाता है वह क्यु बनता है ? क्योकी इन सभी में किसी खास के प्रति हमारा मन नि:स्वार्थ भाव से प्रेम करने लगता है। चाहे वह इंसान हो या कुछ और हम उसके लिये तडपते है बेचैन रहते है सिर्फ प्रेम बस किसी स्वार्थ कि कामना कि पुर्ती के लिये नही ।

जिंदगी में प्रेम से बड़कर कुछ भी नहीं हैं । आज जिंदगी कहाँ जा रही है किसी को भी सोचने की फुरसत नहीं है ।आज किसी को अपने लिए समय है ही नहीं बस भागदौड़ में ही लगा रहता है । पर जिंदगी काफी अनमोल है और इसमें बस प्रेम ही होना चाहिए । मुझे लगता है अगर दुनिया सब लोग बस एक दुसरे से प्रेम करें तो नफरत के लिए कोई जगह नहीं रहेगी । तभी यह समाज वापस से एक खुबसूरत संस्कारी और सुन्दर समाज कह लायेगा। जहा लोग प्रेम से बस प्रेम करेंगे और रिश्तों की इज्ज़त करेगे । तब एक नया जहां होगा 

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